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अभी मंदिर जोड़ेंमध्य प्रदेश के मुरैना जिले में स्थित शनि मंदिर, न केवल धार्मिक महत्व का केंद्र है बल्कि इसका ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व भी है। यह मंदिर देश का सबसे प्राचीन शनि देव मंदिर माना जाता है और त्रेतायुग काल से इसका उल्लेख मिलता है। यहां के धार्मिक और आध्यात्मिक वातावरण के कारण हजारों भक्त अपनी श्रद्धा प्रकट करने और शनि दोष से मुक्ति पाने के लिए यहां आते हैं। आइए, इस लेख में हम शनि मंदिर मुरैना की महिमा और उसकी प्राचीनता के बारे में विस्तार से जानते हैं।
शनिचरा पहाड़ी के बारे में एक विशेष मान्यता है कि इसका निर्माण एक उल्का पिंड के टूटकर गिरने से हुआ था। ज्योतिषियों के अनुसार, यह पिंड आसमान से गिरा और इस स्थल का निर्माण हुआ, जो आज शनिदेव का प्रमुख तीर्थ स्थल है। यह प्राकृतिक घटना इस स्थान को और अधिक रहस्यमय और आध्यात्मिक बनाती है।
शनि देव से जुड़ी एक प्राचीन पौराणिक कथा के अनुसार, जब लंका दहन का समय आया, तो शनिदेव ने बताया कि जब तक वह लंका में हैं, तब तक लंका दहन नहीं हो सकता। वह इतने दुर्बल हो गए थे कि लंका से बाहर जाने में असमर्थ थे। तब हनुमान जी ने अपनी बुद्धिमत्ता का प्रयोग किया और शनिदेव को लंकापति रावण के पैरों के नीचे से मुक्त कराया। इसके बाद हनुमान जी ने शनिदेव को पूरी ताकत से भारत भूमि की ओर फेंका, जिससे वह मुरैना जिले के ऐंती ग्राम के पास शनि पर्वत पर आ गिरे। इसी कारण से इस पर्वत को शनि पर्वत कहा जाता है।
शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि शनि पर्वत पर शनिदेव ने घोर तपस्या की थी, जिसके बाद उन्होंने बल और शक्ति प्राप्त की। त्रेता युग से ही इस पर्वत का धार्मिक महत्व माना जाता है, और यही कारण है कि यहां पर भक्तों की आस्था अटूट है।
इतिहासकारों के अनुसार, इस मंदिर में शनिदेव की मूर्ति और उनके सामने हनुमान जी की प्रतिमा की स्थापना चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ने की थी। यह मंदिर उस काल से लेकर आज तक भक्तों के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। बाद में ग्वालियर के महाराजा दौलतराव सिंधिया ने 1808 ईस्वी में मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया और इसे एक भव्य रूप दिया।
शनिश्चरा पहाड़ी अपने निर्जन वन और अद्वितीय स्थान के कारण अत्यधिक प्रभावशाली मानी जाती है। यह माना जाता है कि इस क्षेत्र में कई संतों ने तपस्या की थी और यहां की गुफाओं में भी संतों की साधना का अनुभव किया गया है। इसके अलावा, यह मंदिर तांत्रिक गतिविधियों के लिए भी प्रसिद्ध है, जो इसे अत्यंत सिद्ध मंदिर बनाता है। शनिदेव की मूर्ति तपस्वी रूप में विराजमान है, जिसमें उनके हाथ में यज्ञोपवीत, नीलमणि और रुद्राक्ष की माला है। यह प्रतिमा शनि देव की तांत्रिक साधना का प्रतीक है, जो इस मंदिर को एक विशेष आध्यात्मिक केंद्र बनाती है।
यह भी माना जाता है कि शनि शिंगणापुर (महाराष्ट्र) में प्रतिष्ठित शनि शिला इसी शनिश्चरा पहाड़ी से ले जाई गई थी। इस मान्यता से शनि पर्वत और शनि शिंगणापुर के बीच एक गहरा संबंध स्थापित होता है, जिससे यहां की धार्मिक महत्ता और भी बढ़ जाती है।
मंदिर परिसर में स्थित एक छोटा पौराणिक पवित्र जल कुंड जिसे गुप्त गंगा धारा कहा जाता है, इसकी एक विशेषता है कि यह जल कभी सूखता नहीं है। यह कुंड हमेशा जल से भरा रहता है, जबकि मंदिर एक बीहड़ क्षेत्र में स्थित है। यह चमत्कारिक जल कुंड भक्तों के लिए एक प्रमुख आकर्षण है और इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है।
हर वर्ष शनि जयंती पर इस मंदिर में एक विशाल मेला लगता है, जिसमें हजारों-लाखों भक्त शामिल होते हैं। शनि मंदिर में दर्शन के बाद यहां की परिक्रमा की भी विशेष महिमा मानी गई है। यह मंदिर न केवल मुरैना बल्कि आसपास के क्षेत्रों में भी श्रद्धालुओं के लिए एक प्रमुख आस्था केंद्र है।
मुरैना का शनि मंदिर, ग्वालियर से लगभग 26 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां आने के लिए आप प्राइवेट टैक्सी या स्थानीय परिवहन का उपयोग कर सकते हैं। इसके अलावा, रेल मार्ग से मुरैना रेलवे स्टेशन तक पहुंचा जा सकता है, जिससे मंदिर तक पहुंचना आसान हो जाता है।
मुरैना का शनि मंदिर धार्मिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक दृष्टि से एक अद्वितीय स्थल है। यहां आने वाले भक्त शनि दोष निवारण के लिए विशेष पूजा करते हैं और मंदिर की पौराणिक कथाओं से जुड़ी श्रद्धा को अनुभव करते हैं। अगर आप आध्यात्मिक शांति और शनि दोष से मुक्ति की तलाश में हैं, तो शनि मंदिर मुरैना की यात्रा अवश्य करें।
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