करौली में मदन मोहन जी के मंदिर में झाड़ू लगाने का कार्य करने वाले एक भक्त थे – उनका नाम था काले खां।
काले खां श्री मदन मोहन लाल जी के मंदिर में झाड़ू लगाया करते थे; यही उनकी जीविका का साधन था।
मंदिर में झाड़ू लगाने का कार्य करते-करते उन्हें प्रतिदिन मदन मोहन जी के दर्शन हो जाते, और यही उनकी दिनचर्या बन गई।
धीरे-धीरे उनकी यह आदत बन गई कि जब तक ठाकुर जी के दर्शन न हो जाएं, उन्हें चैन नहीं पड़ता।
वह प्रतिदिन मंदिर जाते, झाड़ू लगाते। मंदिर के भीतर जाने की अनुमति तो नहीं थी, लेकिन वह पीछे सीढ़ियों के पास खड़े हो जाते। जैसे ही भीड़ इधर-उधर होती, वह बीच में से दर्शन प्राप्त कर लेते।
धीरे-धीरे उनके हृदय में भक्ति स्फुरित होने लगी।
अब वे मंगला आरती से लेकर रात्रि की शयन आरती तक मंदिर में ही रहते।
उनकी इस दिनचर्या से उनकी पत्नी खीझने लगी थी। परिवार वाले उन्हें 'काफ़िर' कहते थे।
उन्हें तरह-तरह के ताने दिए जाते –
"जन्म हमारे कुल में लिया है, लेकिन खुदा को याद नहीं करता, पत्थर को पूजने चला जाता है।"
लेकिन काले खां को इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता था।
इसके विपरीत, अब उनकी पत्नी उनसे दूर रहने लगी।
अब काले खां स्वतंत्र रूप से ठाकुर जी के दर्शन करने लगे।
वह कहते,
"चलो, अब दोपहर को खाना खाने घर नहीं जाना पड़ेगा।
घर जाओ तो चिकचिक सुननी पड़ती है – इससे अच्छा है मंदिर में ही पड़ा रहूं।"
काले खां के घर कोई संतान नहीं थी।
परिवार के लोग ताना मारते –
"अगर खुदा को याद करता तो संतान होता। पत्थर को पूजता है – क्या वह तुझे संतान देगा?"
यह अब प्रतिदिन की बात हो गई थी।
पत्नी भी क्रोधित रहने लगी। कहती –
"संतान नहीं है, हम निसंतान हैं, यह सब तेरे कारण है।"
एक दिन काले खां मदन मोहन जी के मंदिर में गए और दूर से ही हाथ जोड़कर विनय करने लगे –
"हे ठाकुर जी! मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए।
परंतु मेरी पत्नी की बातें, उसका कलह, मेरे परिवार वालों के ताने – ये मेरी भक्ति में बाधा बनते जा रहे हैं।
यह बाधा तभी मिटेगी जब मेरे घर संतान का जन्म हो।
हे नाथ! मुझ पर कृपा करें।
मैं संतान की कामना नहीं करता – बस इतना चाहता हूँ कि एक संतान हो जाए ताकि सब शांत हो जाएं और मैं निश्चिंत होकर आपकी सेवा कर सकूं।"
दिन बीतते गए।
कुछ समय बाद खबर आई – काले खां की पत्नी गर्भवती है।
अब ज़्यादातर लोगों के मुंह अपने-आप बंद हो गए।
काले खां की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा।
वह कहने लगे –
"देखो! तुम कहते थे खुदा को याद करो, लेकिन यह संतान मेरे मदन मोहन ने भेजी है। और जल्द ही उसका आगमन होगा।"
वह समय भी आ गया जब काले खां के घर एक पुत्र का जन्म हुआ।
काले खां बहुत प्रसन्न हुए, परंतु यह प्रसन्नता केवल इसलिए थी कि अब उनकी पत्नी और परिवार वाले संतुष्ट हो गए थे – अब वह पूरी तरह ठाकुर जी की सेवा में लग सकते थे।
समय बीतता गया।
उनका पुत्र आठ वर्ष का हुआ।
एक दिन वह अपने मित्रों के साथ यमुना नदी के किनारे खेल रहा था, तभी एक सर्प ने उसे डस लिया।
वह नीला पड़ गया और बेहोश हो गया।
बच्चे दौड़ते-दौड़ते काले खां के घर गए।
काले खां उस समय मंदिर में थे।
पत्नी को यह समाचार मिला तो वह रोते हुए मंदिर पहुंची और बोली –
"जल्दी चलो! हमारे बेटे को सांप ने डस लिया है। वह नदी किनारे बेहोश पड़ा है।
मैं जा रही हूं – तुम किसी ओझा को लेकर आओ, नहीं तो हमारा बेटा मर जाएगा।"
परंतु काले खां ठाकुर जी की श्रृंगार आरती में व्यस्त थे।
पत्नी ने देखा कि वह अभी भी आरती में लीन हैं।
वह फूट पड़ी –
"अब भी यहीं खड़े हो? हमारा बेटा मरने वाला है, और तुम आरती कर रहे हो!
अगर देर हो गई और कोई झाड़-फूंक वाला नहीं पहुंचा, तो वह मर जाएगा।
अगर उसे कुछ हुआ, तो देख लेना – मैं तुम्हें और तुम्हारे मदन मोहन को नहीं छोड़ूंगी!"
इतना कहकर वह चली गई।
काले खां वहीं खड़े रहे।
उनकी आंखों से आंसू बहने लगे – लेकिन यह दुःख पुत्र के लिए नहीं था।
वह ठाकुर जी से बोले –
"हे ठाकुर जी! क्यों मुझे चैन से नहीं बैठने देते?
मुझे पता है यह सब आपकी लीला है।
आप मुझे परख रहे हैं।
लेकिन मुझे यह दृढ़ विश्वास है कि मेरा पुत्र आपने दिया है, और आप ही उसे बचाएंगे।"
आरती समाप्त होने के बाद काले खां यमुना किनारे पहुंचे।
वहां भीड़ लगी थी।
पत्नी पुत्र के पास बैठी विलाप कर रही थी।
पत्नी चिल्लाई –
"ओझा को क्यों नहीं लाए?"
काले खां बोले – "मैं भूल गया।"
परिवार वालों ने उन्हें बहुत कुछ कहा –
"काफ़िर है, अपने पत्थर वाले को ही देखता रहा।"
काले खां दौड़कर ओझा को लाए।
ओझा ने बालक की नब्ज देखी और कहा –
"बालक अब जीवित नहीं है। उसकी मृत्यु हो चुकी है।"
सब रोने लगे।
काले खां की पत्नी ने अपने पुत्र को उठाया और मदन मोहन जी के द्वार पर लाकर रख दिया।
वह चिल्लाई –
"कहते थे कि यह संतान मदन मोहन लाल ने दी है, तो अब उसे जीवित करके दिखाएं!
अगर यह जीवित नहीं हुआ, तो मैं इसी द्वार पर जान दे दूंगी!
तुम्हें, तुम्हारे भगवान को और पूरे परिवार को नष्ट कर दूंगी!"
तब काले खां ने ठाकुर जी की ओर देखा और भावविभोर होकर कुछ पंक्तियाँ कही –
"मुसाफिक सफिक रफीक दिल दोस्त मेरे, मेरी नज़दीकी हकीकी ख़्याल कीजिए।
मेहरबान कदरदान आला तू जहान बीच, मुझ जैसे ग़रीबों का गुनाह माफ़ कीजिए।
काले बेकरार खड़ा तेरे दरबार पे, नंद के कुमार ज़रा गोर अब कीजिए।
हिंदुओं के नाथ हो तो हमारा कोई दावा नहीं,
लेकिन जगत के नाथ हो तो हमारी भी सुध लीजिए।"
जैसे ही उनके नेत्रों से अश्रुधारा गिरी,
काले खां का पुत्र – जिसका शरीर नीला पड़ चुका था –
धीरे-धीरे श्वेत होने लगा,
उसने आंखें खोलीं, उठकर बैठ गया और बोला –
"अब्बा! अम्मी! वह कहां गया जो मेरे पास खड़ा था?
वह बालक, जो मेरे जैसा ही सांवला था, सिर पर मोर मुकुट था,
उसकी मुस्कान, उसके नेत्र... वह मेरा सखा था... वह कहां गया?"
यह दृश्य देखकर सबने मदन मोहन लाल जी को दंडवत प्रणाम किया।
सब समझ गए – यह कृपा स्वयं ठाकुर जी की है।
तब से आज तक, जब भी मदन मोहन लाल जी की आरती होती है, एक पंक्ति अवश्य गाई जाती है:
"काले के बेटा को जब काले ने खाया,
काले की कविता सुन बेटा जीवायो।।"
जय श्री मदन मोहन लाल जी!
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