बन्धु महंती, जो न तो धनवान थे और न ही श्रेष्ठ जाति में जन्मे थे , जगन्नाथपुरी से कुछ दूरी पर उड़ीसा के एक गाँव में रहते थे और घर-घर जाकर भिक्षा माँगते थे । जो कुछ मिल जाता, उसी से वे स्वयं पवाते थे , पत्नी को पवाते थे , बालकों को पवाते थे । लेकिन कभी-कभी ठाकुर उनकी परीक्षा लेते — एक बार पाँच दिन निकल गए पर महेंद्र जी को भिक्षा नहीं मिली, जिससे पत्नी अति व्याकुल हो गई।
बन्धु महंती अपनी पत्नी और बच्चों को पवा देते थे , पर एक अजीब सी शर्त रखते थे : वे कहते थे कि प्रसाद पवाने के बाद करताल बजाकर भजन करना होगा, प्रभु का गुणगान गाना होगा, कीर्तन करना होगा — ऐसी उनकी शर्त होती थी। पाँच दिन हो गए, अन्न तो मिला नहीं; तब पति ने एक शर्त रखी कि अन्न तो मिला नहीं, अब कीर्तन भी नहीं होगा। पत्नी ने कहा कि जब पेट में अन्न जाएगा तभी तो कीर्तन होगा — बिना अन्न के शरीर दुर्बल होता जा रहा है।
अब बन्धु महंती की चिंता यह नहीं थी कि अन्न नहीं मिल रहा है; उनकी चिंता यह थी कि उनका भजन-साधन रुक जाएगा, कीर्तन रुक जाएगा। बन्धु महंती पुनः भिक्षा माँगने गए परंतु कहीं भिक्षा नहीं मिली — इस तरह आज सातवाँ दिन निकल गया।
बन्धु महंती सोचने लगे, क्या करूँ कीर्तन नहीं होता है — बच्चे भूखे रोने लगे, पत्नी कहती है कि अन्न मिले तो कीर्तन होगा। बन्धु महंती रात में अपनी पत्नी से कहते हैं, “सुनो, मैंने तुमसे एक बात नहीं बताई — मेरे एक मित्र हैं, बहुत धनवान हैं, बड़े सुंदर वस्त्र पहनते हैं और लाखों-करोड़ लोग उनके चरणों में प्रणाम करते हैं।” पत्नी ने पूछा, “अच्छा उनका क्या नाम है?” बन्धु महंती ने कहा, “मेरा और उनके नाम में थोड़ी समानता है — मेरा नाम बन्धु महंती है और उनका नाम दीनबन्धु है। हम मित्र हैं। मेरा मन है कि मैं तुम और बच्चों को उनके पास ले चलूँ; वे हमें भोजन ज़रूर खिलाएँगे।”
भोजन का नाम सुनकर पत्नी इतनी खुश हुई जैसे किसी ने उन्हें आभूषण दे दिए हों। पत्नी ने कहा, “चलो चलते हैं।” बन्धु महंती ने कहा कि वहाँ पहुँचने में पाँच दिन लगेंगे। पत्नी ने कहा, “ठीक है, सुबह तक पहुँच जाएँगे।” पर बन्धु महंती ने कहा, “नहीं — पहुँचने में पाँच दिन लगेंगे।” बन्धु महंती बोले कि एक नीलांचल धाम है, वहाँ वे रहते हैं; पत्नी से झूठ बोला कि वे हमारे मित्र हैं। पत्नी ने कहा, “कोई बात नहीं, हम सह लेंगे — भोजन वहाँ मिलेगा न?” बन्धु महंती ने बोला, “हाँ मिलेगा। वे मेरे मित्र हैं — भोजन भी देंगे, वस्त्र भी देंगे, रहने को घर भी देंगे, सब कुछ देंगे।”
बन्धु महंती अपने परिवार के साथ यात्रा पर निकल पड़े और रास्ते भर जगन्नाथ जी से प्रार्थना कर रहे थे — “हे महाप्रभु, मुझे कुछ नहीं चाहिए, मेरी लाज बचा लेना। मैंने उसको कहा है कि आप उसे भोजन देंगे; कहीं आप वहाँ नहीं मिले तो उसके मन में अविश्वास आ जाएगा — अगर उसके मन में अविश्वास आ गया तो मैं क्या करूँगा?”
बन्धु महंती ने अपनी पत्नी और बच्चों से कहा कि तीन दिन में पहुँच जाएँगे; तब तक कीर्तन और भजन करते रहें। बन्धु महंती रास्ते में लोगों से जबरदस्ती कीर्तन करवाते हैं। अपनी पत्नी और बच्चों को लेकर बन्धु महंती जब जगन्नाथपुरी पहुँचे, तो दूर से ही मंदिर की ध्वजा दिखाई देने लगी। दशा देखकर उन्होंने पत्नी से कहा, “देखो वह ध्वज — उसके नीचे ही मेरा मित्र रहते हैं।” बन्धु महंती ने सिर्फ कथा में ही जगन्नाथ प्रभु के बारे में सुना था। झंडे को देख कर ही बन्धु महंती भावविभोर हो गए; उनकी पत्नी ने बड़ी मुश्किल से उन्हें होश में लाया। अब जो भी मंदिर पास आ रहा था, बन्धु महंती नृत्य कर रहे थे। वे महाप्रभु से कह रहे थे, “प्रभु जी, आपको याद है न — मैंने अपनी पत्नी को आपको अपना मित्र बताया है। किसी और को मत बताइए कि आप मेरे मित्र हैं, बस मेरी पत्नी को बताइए कि आप मेरे मित्र हो।”
थोड़ी देर बाद बन्धु महंती परिवार सहित मंदिर प्रांगण में पहुँचे। ठाकुर जी के रूप को देखकर बन्धु महंती मंत्रमुग्ध हो गए और खुशी से नाचने लगे। अपनी पत्नी से कहते हैं, “देखो मेरे मित्र को — यही है मेरा मित्र, कैसे अपनी भुजाएँ उठा कर मेरा स्वागत कर रहा है।” पत्नी ने कहा, “चलो, गले मिल आओ।” बन्धु महंती ने कहा, “अभी नहीं — कपड़े मैले हैं, नहा धोकर स्वच्छ कपड़े पहनकर फिर मिलने जाऊँगा।”
बन्धु महंती प्रभु से विनती करने लगे कि एक लाज तो बचा ली, दूसरी लाज भी बचा लेना — थोड़ी भोजन आदि की व्यवस्था कर देना। वे रात भर मंदिर के द्वार पर बैठे रहे, पर किसी ने भोजन के बारे में नहीं पूछा। पत्नी बोली, “आप तो कह रहे थे आपका मित्र हमें भजन और प्रसाद दिलवाएगा — दाल-भात, स्वादिष्ट भोजन…” बन्धु महंती ने कहा कि मंदिर में भीड़ है, ठाकुर मिल रहे हैं, इसलिए थोड़ी देरी है — संयम रखो, भजन कराओ। पत्नी ने कहा कि अब तक कीर्तन तब तक नहीं होगा जब तक हमें प्रसाद न मिले।
मध्यरात्रि हो गई और सभी लोग मंदिर से जा चुके थे। बन्धु महंती रुदन करते हुए भगवान से निवेदन कर रहे थे, “प्रभु, लाज बचा लीजिए।” थोड़ी ही देर बाद महाप्रभु स्वयं ब्राह्मण का रूप लेकर थल में महाप्रसाद का भोग लेकर प्रस्तुत हुए। महाप्रभु ने बन्धु महंती के लिए भोजन का थाल अपने हाथ से रखा — विभिन्न प्रकार के भोजन थाल में परोसे, जैसे एक माँ अपने बच्चों के लिए थाल सजाती है।
महाप्रभु मंदिर के पास आकर बन्धु महंती का नाम जोर से पुकारने लगे — “बन्धु महंती नाम का कोई आया है क्या?” बन्धु महंती ने सोचा कि कोई और बन्धु महंती होगा; यहाँ तो कोई उन्हें नहीं जानता। उन्होंने अपने आसपास देखा — यहाँ तो कोई है ही नहीं, मैं ही अकेला हूँ। तब ठाकुर ने सेवक का रूप धारण कर कहा, “अरे भाई, तुम कौन हो, कहाँ से आए हो? निकलो यहाँ से — क्या कर रहे हो?” बन्धु महंती ने कहा, “मैं ही हूँ — बन्धु महंती।”
इतना सुनकर सेवक के रूप में मौजूद महाप्रभु बोले, “तुम ही हो — मैं तुम्हें ढूँढ रहा था। मेरे सपने में कहा गया था कि मेरा मित्र बन्धु महंती आएगा।” बन्धु महंती भाव-विभोर हो गए और बोले कि यही बात मेरी पत्नी के सामने कह दीजिए कि महाप्रभु ने मुझे अपना मित्र कहा है। पत्नी को उठाकर कहा गया, “देखो — महाप्रसाद लेकर आया हूँ।” ठाकुर ने स्वप्न की बात बताई कि उनका मित्र बाहर बैठा है, उसे महाप्रसाद दे आओ।
महाप्रसाद देखकर पत्नी और बच्चे प्रसन्न हुए; बन्धु महंती की लाज बच गई। बन्धु महंती ने महाप्रभु का बहुत-बहुत धन्यवाद किया। सेवक ने कहा कि थाल बहुत महँगा है — ध्यान से मंदिर में ऊपर पहुँचा देना। प्रसाद बन्धु महंती, पत्नी और बच्चों ने पाया और उनका आनंद अनंत था — बन्धु महंती की भूख तो भगवान से मिलन की थी; वे संतुष्ट हो गए।
बन्धु महंती थाल लेकर पूरे मंदिर में घूमे पर वहाँ कोई न मिला; वे सोचने लगे कि थाल किसे दें। डरते हुए उन्होंने थाल अपने पास ही रख लिया और सोचा कि सुबह द्वारपाल या कोई सेवक दिखेगा तो उसे दे दूँगे। प्रातः काल जब मंदिर के पट खुले तो देखा गया कि ठाकुर का थाल वहाँ नहीं है; मंदिर में हड़कम्प मच गया और लोग थाल ढूँढने लगे। रसोईघर का सामान बिखरा पड़ा था — हंडिया फटी पड़ी, चावल बिखरे, सामान अस्त-व्यस्त था। हल्ला मचा और कहा गया कि किसी ने थाल चोरी कर लिया है।
असलियत में बन्धु महंती अपनी नींद से उठे और थाल लेकर मंदिर पहुँचे। मंदिर के कुछ सेवक उन्हें देखकर और उनकी अवस्था देखकर बिना पूछे समझ बैठे कि वे चोर हैं — और बिना पूछे ही बन्धु महंती पर मारपीट शुरू कर दी गई। बन्धु महंती कहने लगे कि रात को जगन्नाथ जी ने रसगुल्ला खिलाया था, और अब इन्हें लात-घूँसे खिला रहे हैं। उनकी पत्नी कहने लगी कि रात में जगन्नाथ जी ने हमें भोजन दिया था — यही थाल उसी समय हमारे पास आया था। पर सेवकों ने उनकी न सुनी और बन्धु महंती को पकड़कर ले गए।
मधु बहन जी और अन्य भक्त जगन्नाथ से प्रार्थना करने लगे — “प्रभु, आपकी लीला कोई समझ न पाए; आप भक्ति को अनेक रूपों में शोभित करते हैं और आप दंड भी दे सकते हैं।” उसी रात जगन्नाथपुरी के राजा के स्वप्न में जगन्नाथ जी स्वयं आए और बोले कि मेरा एक परम भक्त बन्धु महंती है; उस पर मेरे सेवक अत्याचार कर रहे हैं — उन्हें तत्काल रिहा कराओ।
राजा ने जाकर सबको बुलाया और बताया कि जब मंदिर का ताला नहीं टूटा और कोई द्वार नहीं खोला गया, तो थाल बाहर कैसे गया — यह असंभव है। उन्होंने सबको बताया कि महाप्रभु ने स्वयं यह थाल अपने भक्त के लिए बाहर भेजा था। राजा ने घोषणा की कि आज से जो भी धन-सम्पदा और मंदिर की सेवा-इत्यादि है — यह बन्धु महंती को प्रदान की जाए। तब से लेकर आज तक बन्धु महंती के वंशज ही मंदिर की सेवा कर रहे हैं।
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