पुणे के पास एक गांव है जिसका नाम पुरंदरपुर है।
पुरंदरपुर गांव में एक ब्राह्मण रहते थे। उच्च वशिष्ठ कुल में ब्राह्मण जी का जन्म हुआ था। उनका स्वरूप ब्राह्मणों के समान था: तिलक लगाना, शिखा रखना आदि गुण थे, परंतु उनका स्वभाव वैसा नहीं था।
उनका स्वभाव वैश्यों से मिलता था — वैश्य जिन्हें हम व्यापारी वर्ग भी कहते हैं। वे सामान्यतः व्यापारी की तरह गल्ले पर बैठते थे और पैसों को ब्याज पर दिया करते थे।
ब्राह्मणों के कुछ नियम होते हैं: संध्या वंदन करना, ग्रंथों का अध्ययन करना, आचार्य विचार का ध्यान रखना, यज्ञ करना। परंतु इनमें उनमें से एक भी गुण नहीं था।
जिस तरह व्यापारी स्वभाव से कंजूस होता है, वे भी बहुत कंजूस थे।
युवावस्था में इनका विवाह हुआ। इनकी संपत्ति को देखकर एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण की पुत्री से इनका विवाह हुआ। अब स्वभाव से कंजूस होने के कारण उन्होंने अपनी पत्नी के सारे आभूषण उतार लिए, यह कहते हुए कि “नित्य धारण करोगे तो ये घिस जाएंगे।” पत्नी ने उनकी बात का अनुसरण करते हुए सारे आभूषण उतार दिए।
सिर्फ एक मंगलसूत्र उन्होंने धारण किया।
ब्राह्मण देवता (ब्राह्मण जी) ने अपनी पत्नी से मंगलसूत्र उतारने की भी कहा। वे बोले, “यह बहुत अमूल्य है, खराब हो जाएगा, इसे उतारकर अलमारी में रख दो।” पत्नी ने उनकी बात नहीं मानी, कहने लगी: “यह मेरा सुहाग का आभूषण है, मैं ऐसे नहीं उतार सकती।” ब्राह्मण देवता नाराज़ हो गए। अब दशा यह हो गई कि वे पत्नी के हाथ का खाना नहीं खाते, अपनी दुकान पर चले जाते और वहां लड़के से कहते: “जो अपने घर से खाना बनवा लाओ।”
ब्राह्मण देवता की इस अवस्था से उनकी पत्नी को बहुत दुख हुआ। एक रात्रि उन्होंने अपने पति से कहा, “आप कैसे मानेंगे?” ब्राह्मण देवता ने कहा, “बस, इस आभूषण को उतार दो।” पत्नी ने सारे आभूषण उतार दिए, शिवाय उनकी नाक की सोने की कील के।
ब्राह्मण देवता की पत्नी बहुत सात्विक थीं। नाम जप करती थीं, ठाकुर जी की सेवा किया करती थीं।
ब्राह्मण देवता की पत्नी तीर्थ पर भी जाया करती थीं, परंतु अपने मायके वालों के साथ। क्योंकि ब्राह्मण देवता कंजूस थे, वे उन्हें कभी तीर्थ यात्रा पर नहीं ले गए थे। जब भी वह अपने मायके जाती, वहां से तीर्थ यात्रा पर चली जाती थीं।
भगवान (विठ्ठल) ने ब्राह्मण देवता की सारी गतिविधियाँ, उनका कंजूस स्वभाव और पत्नी की भक्ति को देखकर उनकी परीक्षा लेने के लिए ब्राह्मण रूप धारण किया।
विठ्ठल भगवान एक ब्राह्मण के रूप में प्रकट हुए — फटे पुराने धोती, मेला जनेऊ, मुख-मंडल पर झुर्रियाँ — और ब्राह्मण की दुकान पर पहुंचे।
ब्राह्मण देवता ने जैसे ही साधु को दुकान के बाहर देखा, परेशान हो गए। बोले, “अरे, यह तो कुछ मांगने आया होगा, तन पर नहीं है लत्ता, चल दिए कोलकाता — कहो, क्या लेने आए हो?”
साधु ने कहा, “बहुत गरीब हूँ। मेरी बेटी का ब्याह है, मुझे कुछ धन दे दीजिए या कुछ सामान दे दीजिए।”
ब्राह्मण देवता बोले, “अरे, मैं तुम्हें कहां से दूं? मेरा खुद का कुर्ता फटा है, मेरे पास कुछ नहीं है भैया, यहां तो चलते बनो।”
ठाकुर जी (साधु ने) अड़ गए और कहने लगे, “मैं ऐसे नहीं जाऊंगा — मेरी बेटी का ब्याह है, मैं कुछ तो लेकर जाऊंगा।”
ठाकुर जी ने पुणे कहा, “मुझे कुछ काम कर दीजिए, मैं कुछ काम कर दूंगा।”
ब्राह्मण देवता बोले, “नहीं, इसकी कोई जरूरत नहीं है, नौकरशाही करके सारा काम हो गया है, आप यहां से पधारें।”
कुछ देर बाद ब्राह्मण देवता बोले, “मैं इतना कर सकता हूँ — कोई मूल्यवान वस्तु यहां रखो और पैसा ले जाओ। और जो पैसा हो जाए, वस्तु वापस ले जाना।”
ठाकुर जी ने कहा, “ठीक है, मैं थोड़ा ढूंढ़कर लाता हूँ।”
भगवान भी भक्तों के साथ खेलते हैं — जैसा उनका स्वभाव होता है — भगवान ने भी इस परिस्थिति में वही किया।
अब ठाकुर जी ब्राह्मण देवता के घर पहुंचे और वहां जाकर रोने लगे। इतना रोया कि ब्राह्मण देवता की पत्नी बाहर आई और बोली, “अरे, ब्राह्मण देवता, आप इतना रो क्यों रहे हैं? क्या बात है?” ठाकुर जी ने कहा, “छोटी सी मेरी लाली बड़ी हो गई है, उसका ब्याह करना है, मेरे पास पैसा नहीं है, मुझे कोई सहायता नहीं मिल रही। मैंने बहुत कोशिश की। अब मेरे पास घर बचा है, और अगर तुमने मेरी मदद नहीं की तो मैं यहीं अपने प्राण त्याग दूंगा — मेरे जेब में जहर रखा है।”
ब्राह्मण की पत्नी इस बात को सुनकर बहुत भावुक हो गईं — यह भक्ति का स्वभाव होता है: जिसका पीड़ा देखकर वे भावुक हो उठते हैं, और उनके नेत्र सजल हो जाते हैं।
ब्राह्मण देवता की पत्नी के भी नेत्र सजल हो गए। उन्होंने कहा, “मेरे पतिदेव ने बहुत प्रतिबंध लगाए हैं, मैं आपकी मदद नहीं कर सकती।”
इतना सुनकर ठाकुर जी बेहोश होने लगे और बोले, “लो, मैं अभी जहर खा लेता हूँ — अब मुझे कोई रास्ता नहीं बचा।”
यह सुनकर ब्राह्मण देवता की पत्नी ने उनके चरण पकड़े और बोली, “अरे, आप ऐसा मत कीजिए।”
और तुरंत अपनी नाक की सोने की कील उतारकर कहा, “यहियाँ ले जाइए — अधिक तो नहीं मिलेगा, लेकिन थोड़ी सहायता होगी।”
ब्राह्मण देवता (साधु) आभूषण लेकर उसी ब्राह्मण की दुकान पर पहुंचे और बोले, “लो, यह आभूषण रखो, और इसके बदले मुझे कुछ रुपए दे दो।”
ब्राह्मण देवता ने जब वह कील देखा, तो पूछा, “यह तुम्हें कहां से मिली?” ठाकुर जी ने कहा, “आपको क्या लेना-देना? तुम यह रखो बस और मुझे पैसे दो — मेरी बेटी का ब्याह है, मुझे जाना है।”
ब्राह्मण देवता ने तीन-चार बार उसकी कील को देखा, फिर यदि नहीं कर सके तो कील को तिजोरी में रख लिया और जो धन बन पाया, वह ठाकुर जी को दे दिया। ठाकुर जी धन लेकर वहां से चले गए।
ब्राह्मण देवता उसे कील को देखकर समझ गए थे कि यह आभूषण उनकी पत्नी का ही है। उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर कहा, “अभी मैं जाकर देखा हूँ — अच्छा हुआ मैंने उनके सारे आभूषण उतार दिए थे, वरना यह सब दान कर देती।”
ब्राह्मण देवता की दुकान में एक मुनीम काम करता था, जो ब्राह्मण की पत्नी को बहुत मानता था। वह उनके घर पहुंचा और पूछा, “मैया, क्या आज आपने किसी को सोने की कील दान दी थी?”
उन्होंने कहा, “हाँ, आज ब्राह्मण आया था, उसकी पुत्री का विवाह था, इसलिए मैंने उसे वह दान में दे दी।”
मुनीम ने कहा, “वह ब्राह्मण उस कील को आपके पति को गिरवी रखकर कुछ पैसे लेकर गया है।”
यह सुनकर ब्राह्मण की पत्नी बहुत डर गईं, कहने लगीं, “मेरे पतिदेव अब गुस्सा करेंगे आकर।”
ब्राह्मण की पत्नी ने मणिमा पांडुरंग भगवान को याद किया:
“भगवान, मेरी लाज रखो, मेरी रक्षा करो।”
हे ठाकुर जी, आपने कैसा खेल किया है! पहली बार मैंने एक ब्राह्मण की पुत्री के विवाह के लिए दान किया और आज ही धर्म संकट आ गया है — मेरी रक्षा कीजिए, प्रभु!”
ब्राह्मण की पत्नी अपने पति से बहुत डरती थीं। उन्होंने तुरन्त विष का पात्र ले लिया। कहा, “मैं अपने पति का क्रोध सहन नहीं कर पाऊंगी।”
उनके घर में ठाकुरजी का चित्रपट था। उसके सामने जाकर हाथ में विष का प्याला लेकर खड़ी हो गईं और रुदन करने लगीं।
इतने में ही ऊपर से एक नाक का आभूषण विष के पात्र में गिरा।
और जैसे ही खनन-सी आवाज हुई — नेत्र खोलकर देखकर, अपने हाथ को पात्र में डाला — वही नाक की कील हाथ में आ गई।
इतने में ब्राह्मण देवता घर में प्रवेश हुए। वे बहुत क्रोधित थे। बोले, “एक साधन ढूंढोगे, इसे क्यों दीखाऊँ? इसकी पिटाई लगाऊँ।”
पत्नी कमरे के भीतर जाकर पीछे से किवाड़ बंद कर लेने लगी थीं। ब्राह्मण देवता आते ही पत्नी ने पुनः दरवाजा खोला और कहा, “नहीं।”
ब्राह्मण देवता बोले, “आज तो मैं करूंगा।”
तुमने बिना मुझे बताये दान कैसे किया?” पत्नी ने पूछा, “क्या दान किया?”
ब्राह्मण देवता बोले, “तुमने मेरी नाक की कील दी।”
पत्नी ने अपना हाथ आगे किया और कहा, “यह है नाक की कील।”
ब्राह्मण देवता ने पत्नी के हाथ से वह कील लेकर देखा और बोले, “यह कील तुम्हारे पास कैसे आई?”
ब्राह्मण की पत्नी बोलीं, “यह कील तो मेरे पास ही थी। बहुत दिनों से साफ नहीं थी, इसलिए मैंने नाक से उतार ली थी।”
ब्राह्मण देवता ने फिर कहा, “ऐसा हो ही नहीं सकता — मैंने इस कील के बदले मनचाहा धन दिया था, और एक कि मेरी तिजोरी में रखी है, और यह कील मेरे पास है।”
ब्राह्मण देवता इस समय अपनी दुकान में पहुंचे, तिजोरी खोली — और जैसी ही तिजोरी खोली — वह कील वहाँ नहीं थी!
ब्राह्मण देवता समझ गए कि यह कोई स्वप्न नहीं है — यह कुछ और था। उनके नेत्र सजल हो गए।
ब्राह्मण देवता ने अपनी पत्नी से अनुरोध किया, “मुझे सच बताओ — यह क्या है?” पत्नी बोलीं, “सच बताऊं?”
बोलीं, “हाँ बताओ।”
पत्नी ने कहा, “मैंने ही ब्राह्मण देवता को अपनी सोने की कील उनकी पुत्री के विवाह के लिए दान दे दी थी।”
इतने में ब्राह्मण देवता बोले, “अच्छा, वह ब्राह्मण जो मैले कपड़े पहने था, धोती फटी हुई थी?” पत्नी बोलीं, “हाँ, वही ब्राह्मण।”
ब्राह्मण देवता बोले, “सोने की कील मेरी तिजोरी में रखी थी, तब मेरे पास कैसे आई?”
ब्राह्मण की पत्नी बताने लगीं, “जब मैंने देखा आप क्रोध से घर आ रहे हैं, मैंने सोचा कि आप आएंगे, मुझे डटेंगे, मारेंगे — सत्य में मैं अपने प्राण त्याग दूं — तो मैं पांडुरंग जी के सामने रुदन करते हुए विष का पात्र हाथ में लेकर पहुंची।”
“मेरा विष ग्रहण करना हो रहा था और उसी समय आपका आना था — इसी बीच नाक की कील गगन से मेरे पात्र में आकर गिरी।”
ब्राह्मण देवता बोले: “अब मुझे समझ आया कि वह साधु कोई और नहीं, स्वयं पांडुरंग थे — वही साधु-रूप में थे — और उन्होंने ही वह कील मेरे पात्र में डाली थी।”
ब्राह्मण देवता को बहुत खेद हुआ और वे विलाप करने लगे। बोले, “मैं कितना अधम हूँ, नीच हूँ। मैंने जीवन में कभी दान, पुण्य, दर्शन नहीं किया, फिर भी भगवान कितने कृपालु हैं — जिन्होंने मुझे स्वयं दर्शन दिए।”
इस समय ब्राह्मण देवता ने विचार किया, “अब यह जीवन किसके लिए जिएँ?” उन्होंने अपनी दुकान बंद कर दी, घर बेच दिया, और पत्नी के साथ पंढरपुर आ गए।
पंढरपुर में आकर विठ्ठल भगवान के सामने बहुत रोए और कहने लगे:
“नाथ, आपने मेरे जैसे पापी को भी दर्शन दिए। मैंने आपको दुत्कार दिया, बहुत गलत व्यवहार किया — मुझे क्षमा करें, नाथ!”
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दर्शन योग्य बात यह है कि मनुष्य अच्छे से अच्छे व्यक्ति में भी कमी ढूंढ लेता है, और भगवान अधम से अधम, नीच से नीच में भी एक गुण देख लेते हैं और व्यक्ति का उद्धार करते हैं।
जय श्री पांडुरंगा।
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