भगवान के एक परम भक्त थे जिनका नाम श्री केशव दास था। उनका चरित्र अत्यंत पावन और प्रेरणादायक था। एक बार वे एक कथा में बैठे हुए थे। कथा के वक्ता ने कहा, "जीवन की कमाई कहां लगाई जाए जो सात्विक मानी जाए?"
प्रवक्ता ने कहा, "जो कुछ कमाया है वह परिवार में लगाया, घर में लगाया—पर उसकी सार्थकता तब है जब वह ठाकुर जी की प्रसन्नता का कारण बने।" उन्होंने आगे कहा, "यदि वह धन संतों की सेवा में लग जाए तो वही सात्विक और सार्थक है।"
श्री केशव दास जी ने यह बात सुनी और अपनी पत्नी से कहा, "हम जो भी कमाते हैं, उसका थोड़ा-थोड़ा भाग संतों की सेवा में लगाएंगे। क्या तुम सहमत हो?" पत्नी ने मुस्कुरा कर कहा, "मैं पूरी तरह सहमत हूं।"
हालाँकि उनकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी, पर विश्वास दृढ़ था। दोनों ने निश्चय किया कि कमाई का एक अंश संतों की सेवा में अवश्य लगेगा। कहा जाता है कि जब आप दृढ़ निश्चय करते हैं, तो भगवान स्वयं व्यवस्थाएं बनाते हैं।
अब केशव जी नियमित रूप से संतों की सेवा करने लगे। भगवान की कृपा से उतना ही भोजन बनता जितना संतों के लिए पर्याप्त होता। परंतु उनके लिए भोजन नहीं बचता। दोनों पति-पत्नी संतों की पत्तल में बचे प्रसाद को एकत्र करके ग्रहण करते। कई बार वह भी नसीब नहीं होता। फिर भी वे बिना शिकायत के सो जाते।
लेकिन भगवान अपने भक्तों की कठिन परीक्षा लंबी नहीं चलने देते। धीरे-धीरे केशव जी का सारा धन समाप्त हो गया। अब संत सेवा के लिए उनके पास कुछ नहीं था। उन्होंने सोचा, "कर्ज ले लेता हूं, लेकिन संत सेवा नहीं छूटनी चाहिए।"
वे बाजार गए, पर किसी ने उधार नहीं दिया। अंत में एक व्यापारी से मिले, जो चतुर था। व्यापारी ने कहा, "ब्याज नहीं चाहिए, बस एक सेवा कर दो मेरी।"
केशव जी अत्यंत प्रसन्न हुए, बिना पूरी बात सुने कह दिया, "जो सेवा कहोगे, मैं करूंगा।" व्यापारी ने धन दे दिया। केशव जी ने संत सेवा पूरी की और पत्नी से बोले, "अब चिंता मत करो, एक हफ्ते के लिए काफी धन है।"
पत्नी ने पूछा, "कर्ज चुकाओगे कैसे?"
केशव जी बोले, "सेवा से सब हो जाएगा।"
वे व्यापारी के पास सेवा के लिए पहुंचे। व्यापारी ने कहा, "हमारी ज़मीन पर एक कुआँ खोदना है।"
यह आसान काम नहीं था। फिर भी केशव जी ने खुशी-खुशी हां कर दी। वे हर दिन खुदाई करते—फावड़ा चलाते, मिट्टी भरते और राम नाम जपते। उन्होंने नियम बनाया कि सिर्फ राम नाम जपेंगे, कोई सांसारिक बात नहीं।
पत्नी को शक हुआ, वह भी एक दिन वहां पहुंच गई। पति के साथ मिट्टी फेंकने लगी। केशव जी बोले, "मैं भरता हूं, तुम फेंको और राम नाम जपो।"
अब दोनों को आनंद आने लगा—सेवा भी हो रही थी और राम नाम का जप भी। व्यापारी भी प्रसन्न था।
कुछ दिनों बाद कुएं में जल आ गया। लेकिन एक तेज़ हवा चली और ढीली मिट्टी फिसल कर अंदर गिर गई। केशव जी उसमें दब गए। पत्नी रोती हुई चिल्लाई, "बचाओ! मेरे पति कुएं में दब गए!" पर कोई नहीं आया, क्योंकि वे गरीब थे। लोगों ने उन्हें मृत मान लिया। पत्नी को घर भेज दिया गया।
एक महीना बीत गया। केशव जी को मृत घोषित कर दिया गया।
जहाँ कुआं था, वहाँ एक मिट्टी का टीला बन गया। लोग जब उस जगह से गुजरते तो राम नाम की ध्वनि सुनते। साथ में ढोल, मंजीरा, करताल जैसी मधुर ध्वनियाँ भी आतीं। लोगों को लगा, आसपास कोई महोत्सव चल रहा है। पर पास के गाँव में कोई उत्सव नहीं था।
राजा को जब पता चला, तो सैनिकों को भेजा गया। उन्होंने मिट्टी हटवाई। अंदर एक कुंज जैसी जगह बनी थी, जहाँ केशव दास जी ध्यान मग्न होकर कीर्तन कर रहे थे। पास में दीप जल रहा था, प्रसादी रखी थी, और जीव-जंतु उनके साथ कीर्तन में रमे हुए थे।
नाम जप की महिमा सामान्य नहीं होती। उस राम नाम के प्रभाव से जो असंभव लग रहा था, वह संभव हो गया।
इस तरह केशव दास जी कुएं से बाहर निकले और संसार ने स्वयं देखा कि राम नाम का प्रभाव कितना अद्भुत होता है।
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