वृंदावन को संतों की भूमिका कहा जाता है इन्हीं में से थे माधव दास जी। माधव दास जी भगवान के प्रति सखा भाव रखते थे। कुछ दिनों के लिए माधव दास जी श्री जगन्नाथ पुरी में रहने के लिए गए।
भिक्षाटन के लिए वह नगर में चले जाते और नारायण हरि की आवाज लगाते। उस नगर में एक बुजुर्ग महिला रहती थी। जब भी माधव दास जी उस महिला के द्वार पर जाते। वह उन्हें भला बुरा कहती। वह कहती- आ गया हट्टा कट्टा, काम धाम करो जाके। कभी-कभी उन्हें गाली भी दे दिया करती थी।
माधव दास जी से लोगों ने पूछा आप उसे महिला के द्वार पर क्यों जाते हैं वह आपको भिक्षा में कुछ भी नहीं देती। माधव दास जी ने कहा किसने कहा वह कुछ नहीं देती है वह वोह देती है जो कोई और नहीं देता है वह गाली देती है।
संतों में सदेव सहनशीलता होती है। वह क्रोध विजय होते हैं। हर वस्तु में उन्हें अपने ईष्ट का दर्शन होता है। हर वाणी को प्रभु की वाणी समझते हैं।
उस बुजुर्ग महिला के घर में एक भी नाती पोता नही था। एक दिन प्रातः माधव दास जी पुनः उसे बुजुर्ग महिला के द्वार पर भिक्षाटन के लिए गए। उसे वक्त महिला पोते (एक प्रकार का कपड़ा जो मिट्टी से सना होता है) से चूल्हा साफ कर रही थी। उसे महिला ने वह पोता ही माधव दास जी की तरफ फेंक के मारा जो संत माधव दास की छाती पर जाके लगा।
संत माधव दास जी ने कहा:
"माधव दास उत्तर भी इसी का देगा, पोता तूने दिया है।
जा पोता ही तुझे मिलेगा।।"
संत के वचन से बुजुर्ग महिला के घर पोते का जन्म हुआ
बुजुर्ग महिला ने बारंबार संत का अभिवादन किया और कहा:
"पोता ना दीनो प्रेम से, रिशवश दीनो मार,
ऐसे पुण्य से सखी पोता खेलत मेरे द्वार।
जो मैं ऐसे संत को देते प्रेम प्रसाद ,
तो घर में सुत उपजाते ध्रुव और प्रह्लाद।।
- राजेश्वरानंद जी महाराज
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