जनकपुर के पास एक छोटे से गांव में एक विधवा ब्राह्मणी रहती थी। उसका एक ही बेटा था जिसका नाम प्रयाग दास था। वह दोनों गरीब थे इसलिए भिक्षा मांग कर गुजारा कर लिया करते थे। जो मिल जाता उसी से गुजर बसर करती बेटे को भी प्रसाद समझ कर पवा देती। सावन के महीने में रक्षाबंधन का दिन आया। सभी बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधने लगी। प्रयाग दास की गरीबी के कारण उसकी कलाई पर किसी ने राखी नहीं बांधी।
प्रयागदास ने मां से बोले मां मुझे किसी ने राखी नही बांधी। मां बोली तुम्हारे कोई बहन नहीं है। प्रयाग दास बोले जो सबकी बहन है वह मेरी बहन क्यों नहीं है मुझे भी राखी बांध सकती हैं। परंतु गरीबी के कारण किसी ने भी प्रयागदास की कलाई पर राखी नहीं बांधी। प्रयाग दास जिद करने लगे। मां ने खूब समझाया पर वह नहीं माने अंततः मां ने कहा तुम्हारी बहन है जो इस समय ससुराल में है। ससुराल अयोध्या में है।
यह सुनकर बालक प्रयागदास अयोध्या के लिए प्रस्थान करने की जिद करने लगा। मां बोली अभी नहीं, मैं लेकर जाऊंगी।
बालक प्रयागदास के मन में ललक लगी रही की बहन से मिलू। बहन की ससुराल जाऊं।
मां के पास दो साड़ी थी। एक पहनी थी और एक साफ धुली हुई रखी थी। बालक ने साफ साड़ी जो कई जगह से फटी थी , उसे ही लेकर पैदल चल दिया। बालक नंगे पांव ही जनकपुर से अयोध्या की ओर चल दिया। बालक प्रयाग दास के मन में भगवान के प्रति अटूट श्रद्धा थी।
चलते-चलते प्रयागदास बहुत थक गया और वह जंगल में एक पेड़ के नीचे वह सो गया।
भगवान जिसे अयोध्या में अपने पास बुलाना चाहे उसे कौन रोक सकता है। बालक प्रयागदास जब सोया तो जंगल में था जब उसकी आंख खुली तो वह अयोध्या में था। आसपास के लोगों से उसने पूछा भैया यह कौन सा नगर है लोगों ने कहा कि यह अयोध्या है। प्रयागदास ने कहा: अरे मेरे बहन की ससुराल आ गई।
बालक प्रयाग दास ने एक सज्जन से पूछा हमारी बहन यहां रहती हैं उनका मकान कौन सा है? उनका नाम सीता है। और हमारी बहनोई का नाम श्री राम जी है। सज्जन ने कहा यह अयोध्या है यहां राम जी सीता जी का मंदिर है। परंतु प्रयाग दास बोला मुझे मंदिर नहीं, मकान चाहिए, जहां मेरी बहन रहती हैं।
मैं अपनी बहन से मिलने आया हूं। दिनभर खोजा लेकिन नहीं मिले अब वह मन ही मन बड़ बड़ाने लगा। मां ठीक कहती थी बड़े आदमी हैं यह दिन में नहीं मिलेंगे। गरीबों के कोई रिश्तेदार नहीं होते। मैं कल वापस लौट भी जाऊंगा। इसीलिए मां मना करती थी मुझे यहां नहीं आना चाहिए था। यह कहते कहते वह एक पेड़ के नीचे सो गया।
तभी रात्रि में एक दिव्य प्रकाश हुआ। उसकी आंखें चौंधिया गई। उसने देखा एक विशाल काय हाथी। हाथी पर होदा, महावत की जगह हनुमान जी और हाथी के होदा पर प्रभु श्री राम एवम सीता जी। सेवक पीछे पीछे चल रहे है। बालक को यह लगा कही हाथी के पांव के नीचे न कुचलवा दे
लेकिन वह देखता है की हाथी रुक गया,नीचे बैठ गया। सेवको ने सीडी लगाई। श्री राम जी सीता जी नीचे उतरे। हनुमान जी भी नीचे उतरे।
बालक यह देख रहा था तभी सीताराम जी बालक के पास आकर खड़े हो गए। प्रभु राम जी ने कहा: बालक प्रयाग दास यह सीता है आपकी बहन। प्रयागदास ने सोचा यह मेरा नाम भी जानते हैं और कह रहे हैं यह मेरी बहन है। परंतु प्रयाग दास बोला मुझे नहीं लगता यह मेरी बहन है। प्रभु ने पूछा क्यों
प्रयगदास ने बोला मैं बहन की पहचान जानता हूं। प्रभु बोले क्या होती है बहन की पहचान। प्रयाग दास जी ने कहा अगर मेरी यह बहन होती हैं तो मुझे देखकर भाव से अश्रुपूरित हो जाती , यू चुपचाप खड़ी नहीं होती।
इतना सुनते ही सीता जी ने कहा: मैंया मुझे भूल गई है परंतु भाई मुझे नहीं भुला। इतना कहकर सीता जी के नेत्र अश्रु पुरित हो गए। और उन्होंने प्रयागदास को हृदय से लगा लिया। रक्षाबंधन का दिन है में तुम्हारे राखी बांधती हूं। माता सीता प्रयागराज के राखी बांधती हैं प्रयाग दास जी सर झुका कर खड़े हैं उनकी आंखों से आंसू बह रहे हैं। प्रयाग दास जी अपनी बहन को साड़ी देने की सोचते हैं। परंतु इतना वैभव देखकर वह सकुचा जाते है परंतु वह साड़ी दे देते है।
मां सीता कहती है भैया मेरी मां के पास दो ही साड़ियां है जिनमें से एक साड़ी आप ले आए हैं यह साड़ी आप वापस ले जाओ मां से कहना मां के आशीर्वाद से मैं यहां खूब आनंद में हूं।थोड़ी ही देर में प्रभु मय सेवकों समेत अंतर ध्यान हो गए।
प्रयाग दास रोते रहे, रात भर सोए नहीं। सवेरे वसिष्ठ कुंड की ऊपर एक महात्मा जी रहते थे वह प्रयागदास के पास आए। जैसे ही उन्होंने प्रयागराज को देखा वह समझ गए इसे कृपा प्राप्त हो हुई है। वह प्रयाग दास जी को अपने आश्रम ले गए।
दोपहर के भजन में दो देवियां स्वर्ण के थाल में भजन लेकर आई और कहां हमारे सत्यनारायण भगवान की कथा थी उसका प्रसाद है । काफी देर हो गई वह थाल लेने कोई नही आया। महात्मा जी समझ गए कि यह किशोरी जी ने भाई की पहुनाई की है। महात्मा जी बोले प्रयागराज यह स्वर्ण थल तुम्हारे लिए है तुम इन्हें अपने साथ घर ले जाओ।
प्रयाग दास बोले बहन का धन लेकर मैं नहीं जाऊंगा। यह थाल आप ही रख लो। महात्मा जी बोले मैं इसका अधिकारी नहीं हूं ।अब दोनों ने सलाह करके वह थाल वशिष्ट कुंड में डाल दिए।
बालक प्रयागदास दूसरे दिन जनकपुरी वापस लौट आए। यहां पर मां का रो रोकर बहुत बुरा हाल था। सारी बात सुनकर मां बोली,किशोरी जी आपने मेरी वाणी की लाज रख ली।
बालक प्रयागदास 15 वर्ष के हो चुके थे यहां मां का स्वर्गवास हो गया अब वह अकेले रह गए।
प्रयागदास अयोध्या चले गए वहां पर एक महात्मा जी से मिले उनके शिष्य बने एवम अब प्रयागदास जी महात्मा प्रयागदास हो गए। और किशोरी जी से संबंध होने के कारण सब उन्हें मामा प्रयागदास कहने लगे।
संत प्रयागदास जी की जय
जय श्री राम
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