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अष्टावक्र और राजा जनक: सत्य की खोज की अद्भुत कथा

अष्टावक्र और राजा जनक: सत्य की खोज की अद्भुत कथा

स्वप्न और यथार्थ का संघर्ष

विदेह नरेश राजा जनक एक दिन अपने महल में सुखद शय्या पर विश्राम कर रहे थे। उसी समय उन्होंने एक विचित्र स्वप्न देखा—

उनका राज्य नष्ट हो गया, शत्रुओं ने उन पर आक्रमण कर दिया और उनके महल पर अधिकार कर लिया। वे अब जंगल में भटक रहे थे, भूख से व्याकुल होकर। कई दिनों के उपवास के बाद, किसी तरह उन्हें चावल और दाल मिले। उन्होंने मिट्टी के पात्र में भोजन पकाया, लेकिन जैसे ही वह तैयार हुआ, दो लड़ते हुए सांड आए और खिचड़ी बिखेर दी। भूख से बेहाल, वे अत्यंत दुखी हो गए।

अचानक उनकी आँख खुली। वे पुनः अपने महल में सुखद शय्या पर लेटे थे। वह सोचने लगे—

"जो अभी हुआ, वह सत्य था या जो मैं अभी देख रहा हूँ, वह सत्य है?"

दरबार में प्रश्न और कोई उत्तर नहीं

अगले दिन राजा जनक ने एक विशाल विद्वत्सभा का आयोजन किया, जहाँ अनेक ऋषि-मुनि और महात्मा उपस्थित थे। उन्होंने सभा में प्रश्न रखा—

"यह सत्य या वह सत्य?"

परंतु कोई भी विद्वान संतोषजनक उत्तर नहीं दे सका।

अष्टावक्र का दिव्य ज्ञान

उसी समय बाल्यावस्था से किशोरावस्था में प्रवेश कर रहे परम ज्ञानी ऋषि अष्टावक्र भी सभा में उपस्थित थे।

उनकी अद्भुत बुद्धि का प्रमाण तो तभी मिल गया था जब वे गर्भ में ही अपने पिता को वेदों की शुद्ध ऋचाएँ सुधारने का उपदेश दे चुके थे। उनके पिता, ऋषि कहोड़, वेदों के महान ज्ञानी थे।

एक दिन वे वेद-पाठ कर रहे थे, तभी उन्होंने एक मंत्र का उच्चारण गलत कर दिया। तभी गर्भ से एक आवाज आई—

"इस ऋचा को सुधारो!"

इसपर ऋषि कहोड़ चकित रह गए। उन्होंने अपनी पत्नी से पूछा—

"यह आवाज कहाँ से आई?"

पत्नी ने उत्तर दिया—

"गर्भ से!"

क्रोधित होकर ऋषि कहोड़ बोले—

"यह कितना टेढ़ा है कि जन्म से पहले ही पिता को उपदेश दे रहा है!"

और उन्होंने शाप दिया—

"जा, अष्टावक्र हो जा!"

इसी कारण अष्टावक्र जी जन्म से ही शरीर के आठ स्थानों से टेढ़े थे

राजा जनक की सभा में प्रवेश

राजा जनक की सभा में कई विद्वान ऋषि-महर्षि उपस्थित थे, जिनमें अष्टावक्र के पिता ऋषि कहोड़ भी थे।

उस समय नियम यह था कि जो भी राजा के प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाता, उसे महल में ही रहना पड़ता। उन्हें सारी सुविधाएँ मिलती थीं, लेकिन जब तक उत्तर नहीं मिलता, वे बाहर नहीं जा सकते थे।

जब अष्टावक्र जी को यह पता चला, तो उन्होंने अपनी माता से कहा—

"मुझे सभी बालक चिढ़ाते हैं कि यदि मैं इतना ज्ञानी हूँ, तो अपने पिता को मुक्त क्यों नहीं करवा लेता?"

उन्होंने माता से पूछा—

"पिता को किसने बंदी बनाया है?"

माता ने कहा—

"वे बंदी नहीं हैं, लेकिन जब तक वे राजा जनक के प्रश्न का उत्तर नहीं दे देते, तब तक महल में ही रहेंगे।"

अष्टावक्र जी बोले—

"माँ, वह प्रश्न क्या है? मैं उसका उत्तर दूँगा!"

माँ ने रोका—

"मैं अपने पति के वियोग को सह गई, परंतु पुत्र, तुम्हारा वियोग सहन नहीं कर पाऊँगी!"

अष्टावक्र जी बोले—

"माँ, आप निश्चिंत रहें!"

अष्टावक्र जी का ज्ञान और जनक का प्रश्न

जब अष्टावक्र जी राजा जनक की सभा में पहुँचे, तो उनकी शारीरिक विकृति देखकर सभी हँसने लगे

उन्होंने गम्भीरता से कहा—

"मैंने सुना था कि राजा जनक की सभा ज्ञानियों की सभा होती है, परंतु यहाँ तो सभी अज्ञानी दिख रहे हैं, जो केवल चमड़े और हड्डी को देखकर निर्णय कर रहे हैं!"

राजा जनक बोले—

"आप हमारी सभा को इस प्रकार संबोधित नहीं कर सकते। यहाँ ज्ञान और विज्ञान से संपन्न लोग उपस्थित हैं!"

अष्टावक्र जी ने पूछा—

"आप सब हँसे किसे देखकर?"

सभा के लोग बोले—

"आपकी टेढ़ी चाल देखकर!"

अष्टावक्र जी मुस्कुराए और बोले—

"बोलने की शक्ति शरीर में है, और शरीर किससे बना है? चमड़े, मांस और हड्डियों से। तो क्या ज्ञानी वह होता है, जो केवल मांस, हड्डी और चमड़े को देखकर विचार करे?"

अब सभा में मौन छा गया।

इसके बाद अष्टावक्र जी ने राजा जनक से पूछा—

"प्रश्न क्या है, राजन्?"

राजा जनक बोले—

"यह सत्य या वह सत्य?"

अष्टावक्र जी ने उत्तर दिया—

"ना यह सत्य है, ना वह सत्य। जब तुम जाग्रत अवस्था में थे, तो स्वप्न असत्य प्रतीत हुआ, और जब स्वप्न में थे, तो जाग्रत अवस्था का कोई अस्तित्व नहीं था। जो एक क्षण में अपना अस्तित्व खो दे, वह सत्य नहीं हो सकता। सत्य का कभी अभाव नहीं होता। सत्य सदा विद्यमान रहता है!"

अष्टावक्र जी बने जनक के गुरु

राजा जनक को यह उत्तर सुनकर आत्मज्ञान प्राप्त हुआ

उन्होंने अष्टावक्र जी के चरणों में नतमस्तक होकर उन्हें गुरु का पद प्रदान किया और सिंहासन से उतारकर गुरु-गद्दी पर आसीन किया

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